14 अगस्त की शाम सवा पांच बजे के आसपास जब पहलू ख़ान के बेटे के मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी तो वो घर पर ही थे.
पिछले कई दिनों से वो सो नहीं पाए थे.
14 अगस्त को उनके पिता की मौत पर निचली अदालत का फ़ैसला आने वाला था.
लेकिन फ़ोन पर दूसरी ओर वकील की बात सुनकर वो सन्न रह गए.
अदालत ने सभी अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
इरशाद के चेहरे पर, चार कमरे के घर में जैसे निराशा छा गई.
फ़ैसले के समये से घर में खाना नहीं बना था. लेकिन कब तक? जब हम घर पहुंचे तो आख़िरकार खाना बनाने की तैयारी हो रही थी.
बात करते वक़्त ऐसा लग रहा था कि इरशाद कभी भी रो देंगे.
इरशाद बताते हैं, "जब से ये ख़बर मिली है, तबसे दिमाग़ में और कुछ नहीं आ रहा है. हम न्याय की उम्मीद कर रहे थे और अदालत ने उन लोगों को बरी कर दिया."
ढाई साल पहले अप्रैल 2017 को जब कथित गोरक्षकों ने पहलू ख़ान को बेरहमी से पीटा था तब वो वीडियो वायरल हो गया था.
उस वक़्त पहलू ख़ान के अलावा इरशाद, उनका एक भाई और गांव के दो और लोग जयपुर से गाय ख़रीदकर गांव वापस लौट रहे थे जब कथित गोरक्षकों ने उनसे पैसे छीने और लंबे समय तक जमकर पीटा.
पहलू ख़ान की पसलियां टूट गई थीं और उनके सिर में काफ़ी चोट आई थी. कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई.
भारत में पिछले कुछ सालों में अख़बार के पन्ने इरशाद, अख़लाक़, अंसारी जैसों की कहानियों से पटे पड़े हैं.
हाल में ही छपी ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ "मई 2015 और दिसंबर 2018 के बीच भारत के 12 राज्यों में कम से कम 44 लोग मारे गए जिनमें 36 मुसलमान थे. इस अवधि में 20 राज्यों में 100 से अधिक अलग-अलग घटनाओं में क़रीब 280 लोग घायल हुए."
इरशाद कहते हैं, "सारे लोगों को बरी कर दिया गया है. तो फिर (मेरे पिता को) किसने मारा. पुलिस या कोर्ट हमें मुलज़िम तो लाकर दे. उन्हें किसने मारा."
"वीडियो में दिखने के बाद भी लोगों को बरी कर दिया गया. हमें उसका सदमा है, और उससे चोट हमें पहुंच रही है."
ढाई साल पहले पहलू ख़ान के फलते फूलते घर में 7-8 गाय, भैसें थीं और दूध बेचने से उन्हें 20-25 हज़ार मासिक की आमदनी हो जाती थी.
ढाई साल बाद घर की आर्थिक हालत जर्जर है. घर में एक भैंस और एक बछड़ा है. इरशाद के लिए ये ढाई साल विरोध प्रदर्शनों, वकीलों, अदालतों के चक्कर काटते बीते हैं.
घर के सामने टूटे-फूटे ईंट, गारे का ढेर अपनी ही कहानी कह रहे थे.
पिछले सालों में आर्थिक मदद के तौर पर जो भी 10-12 लाख रुपये मिले, वो सब और घर की सारी कमाई धरने, प्रदर्शन और केस में ख़र्च हो गए. उन्होंने ख़ुद काम धंधा छोड़ दिया. सारा ध्यान पिता के केस पर केंद्रित रखा.
पिता के बाद घर का ख़र्च गांव वालों, रिश्तेदारों और दोस्तों के भरोसे चल रहा है.
वो कहते हैं, "उनके मरने के बाद एक कौड़ी जोड़ी नहीं. बिगड़ा है, बना कुछ नहीं. हमारे घर की आर्थिक हालत ख़राब है लेकिन हमें अदालत से न्याय की उम्मीद है. गांव, रिश्तेदारों की मदद से ये ढाई साल बिताए हैं."
जिस वायरल वीडियो से दुनिया को इस घटना के बारे में पता चला, अदालत ने अपने फ़ैसले में उस वीडियो को सुबूत मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वकीलों के मुताबिक़ लैब रिपोर्ट से न तो उसकी जांच हुई, साथ ही क़ानूनी तौर पर उस वीडियो की विश्वसनीयता भी प्रमाणित नहीं हो पाई.
आश्यर्च भरी आवाज़ में इरशाद कहते हैं, "ये वीडियो हमारे आदमी ने थोड़ी बनाया है. ये फ़र्ज़ी कैसे हो सकता है?"
पीछे बैठी इरशाद की मां जैबुना बेगम प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बेटे की बात सुन रही थीं. पिछले ढाई साल में चेहरे की लकीरें और गहरी हो गई थीं. आवाज़ में भारीपन था.
इरशाद से बात करते वक़्त ऐसा लगा कि वो बात तो मुझसे कर रहे थे लेकिन उनका दिमाग़ कहीं और था. बात करते करते उनका ध्यान हाथ में रखे मोबाइल फ़ोन पर चला जाता था और वो कहीं खो जाते थे.
वो कहते हैं, "मैं पहले ऐसा नहीं था. इस हालत में नहीं था. मेरे घर की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर है. मुझे घर को देखना है."
इरशाद कहते हैं, "नींद नहीं आ रही है. अब कैसे नींद आएगी. ढाई साल से भागते भागते ये दिन आया था. हमें ऐसा फ़ैसला सुनाया गया है. इससे अच्छा होता कि हम मर जाते तो बेहतर होता. क्या करेंगे हम ऐसे हिंदुस्तान में रह कर. कि सरेआम सारी दुनिया मारते हुए सब देख रही है और फिर उन लोगों को बरी कर दिया. ये चीज़ हम कैसे बरदाश्त करेंगे."
गुज़रे ढाई साल का दर्द ऐसा है कि उसे शब्दों में बांधना आसान नहीं.
जैबुना कहती हैं, "ढाई साल में जीवन बेकार हो गया है, इससे तो मर जाना बेहतर है. हमें लगता था कि अदालत से हमें न्याय मिलेगा लेकिन हमें न्याय नहीं मिला. ढाई साल में हम बरबाद भी हो गए, हमारा आदमी भी मर गया. इससे ज़्यादा बुरा और क्या होगा?"
"हमें लगता था कि हमारे साथ अदालत न्याय करेगी, लेकिन अदालत भी न्याय नहीं कर रही है. कल से हमारे यहां शोक मनाया जा रहा है. किसी बच्चे ने खाना भी नहीं बनाया. वो लोग ख़ुशी मना रहे है. हम तो लुट भी गए, पिट भी. हमारा आदमी भी चला गया."
इरशाद का परिवार मामले को ऊंची अदालत में चुनौती देने पर अडिग है.
जब तक हमारी ज़िंदगी है तब तक लड़ते रहेंगे. छोड़ेंगे नहीं. चाहे कुछ भी बिक जाए. हमको जिस दिन मार देंगे तो हम केस को छोड़ देंगे.
लेकिन ऊँची अदालत में जाने से पहले ये समझने की कोशिश जारी है कि इस निचली अदालत में ये केस अभियोग पक्ष कैसे हार गया.
दोनो पक्ष पुलिस जांच की आलोचना कर रहे हैं.
पिछले कई दिनों से वो सो नहीं पाए थे.
14 अगस्त को उनके पिता की मौत पर निचली अदालत का फ़ैसला आने वाला था.
लेकिन फ़ोन पर दूसरी ओर वकील की बात सुनकर वो सन्न रह गए.
अदालत ने सभी अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
इरशाद के चेहरे पर, चार कमरे के घर में जैसे निराशा छा गई.
फ़ैसले के समये से घर में खाना नहीं बना था. लेकिन कब तक? जब हम घर पहुंचे तो आख़िरकार खाना बनाने की तैयारी हो रही थी.
बात करते वक़्त ऐसा लग रहा था कि इरशाद कभी भी रो देंगे.
इरशाद बताते हैं, "जब से ये ख़बर मिली है, तबसे दिमाग़ में और कुछ नहीं आ रहा है. हम न्याय की उम्मीद कर रहे थे और अदालत ने उन लोगों को बरी कर दिया."
ढाई साल पहले अप्रैल 2017 को जब कथित गोरक्षकों ने पहलू ख़ान को बेरहमी से पीटा था तब वो वीडियो वायरल हो गया था.
उस वक़्त पहलू ख़ान के अलावा इरशाद, उनका एक भाई और गांव के दो और लोग जयपुर से गाय ख़रीदकर गांव वापस लौट रहे थे जब कथित गोरक्षकों ने उनसे पैसे छीने और लंबे समय तक जमकर पीटा.
पहलू ख़ान की पसलियां टूट गई थीं और उनके सिर में काफ़ी चोट आई थी. कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई.
भारत में पिछले कुछ सालों में अख़बार के पन्ने इरशाद, अख़लाक़, अंसारी जैसों की कहानियों से पटे पड़े हैं.
हाल में ही छपी ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ "मई 2015 और दिसंबर 2018 के बीच भारत के 12 राज्यों में कम से कम 44 लोग मारे गए जिनमें 36 मुसलमान थे. इस अवधि में 20 राज्यों में 100 से अधिक अलग-अलग घटनाओं में क़रीब 280 लोग घायल हुए."
इरशाद कहते हैं, "सारे लोगों को बरी कर दिया गया है. तो फिर (मेरे पिता को) किसने मारा. पुलिस या कोर्ट हमें मुलज़िम तो लाकर दे. उन्हें किसने मारा."
"वीडियो में दिखने के बाद भी लोगों को बरी कर दिया गया. हमें उसका सदमा है, और उससे चोट हमें पहुंच रही है."
ढाई साल पहले पहलू ख़ान के फलते फूलते घर में 7-8 गाय, भैसें थीं और दूध बेचने से उन्हें 20-25 हज़ार मासिक की आमदनी हो जाती थी.
ढाई साल बाद घर की आर्थिक हालत जर्जर है. घर में एक भैंस और एक बछड़ा है. इरशाद के लिए ये ढाई साल विरोध प्रदर्शनों, वकीलों, अदालतों के चक्कर काटते बीते हैं.
घर के सामने टूटे-फूटे ईंट, गारे का ढेर अपनी ही कहानी कह रहे थे.
पिछले सालों में आर्थिक मदद के तौर पर जो भी 10-12 लाख रुपये मिले, वो सब और घर की सारी कमाई धरने, प्रदर्शन और केस में ख़र्च हो गए. उन्होंने ख़ुद काम धंधा छोड़ दिया. सारा ध्यान पिता के केस पर केंद्रित रखा.
पिता के बाद घर का ख़र्च गांव वालों, रिश्तेदारों और दोस्तों के भरोसे चल रहा है.
वो कहते हैं, "उनके मरने के बाद एक कौड़ी जोड़ी नहीं. बिगड़ा है, बना कुछ नहीं. हमारे घर की आर्थिक हालत ख़राब है लेकिन हमें अदालत से न्याय की उम्मीद है. गांव, रिश्तेदारों की मदद से ये ढाई साल बिताए हैं."
जिस वायरल वीडियो से दुनिया को इस घटना के बारे में पता चला, अदालत ने अपने फ़ैसले में उस वीडियो को सुबूत मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वकीलों के मुताबिक़ लैब रिपोर्ट से न तो उसकी जांच हुई, साथ ही क़ानूनी तौर पर उस वीडियो की विश्वसनीयता भी प्रमाणित नहीं हो पाई.
आश्यर्च भरी आवाज़ में इरशाद कहते हैं, "ये वीडियो हमारे आदमी ने थोड़ी बनाया है. ये फ़र्ज़ी कैसे हो सकता है?"
पीछे बैठी इरशाद की मां जैबुना बेगम प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बेटे की बात सुन रही थीं. पिछले ढाई साल में चेहरे की लकीरें और गहरी हो गई थीं. आवाज़ में भारीपन था.
इरशाद से बात करते वक़्त ऐसा लगा कि वो बात तो मुझसे कर रहे थे लेकिन उनका दिमाग़ कहीं और था. बात करते करते उनका ध्यान हाथ में रखे मोबाइल फ़ोन पर चला जाता था और वो कहीं खो जाते थे.
वो कहते हैं, "मैं पहले ऐसा नहीं था. इस हालत में नहीं था. मेरे घर की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर है. मुझे घर को देखना है."
इरशाद कहते हैं, "नींद नहीं आ रही है. अब कैसे नींद आएगी. ढाई साल से भागते भागते ये दिन आया था. हमें ऐसा फ़ैसला सुनाया गया है. इससे अच्छा होता कि हम मर जाते तो बेहतर होता. क्या करेंगे हम ऐसे हिंदुस्तान में रह कर. कि सरेआम सारी दुनिया मारते हुए सब देख रही है और फिर उन लोगों को बरी कर दिया. ये चीज़ हम कैसे बरदाश्त करेंगे."
गुज़रे ढाई साल का दर्द ऐसा है कि उसे शब्दों में बांधना आसान नहीं.
जैबुना कहती हैं, "ढाई साल में जीवन बेकार हो गया है, इससे तो मर जाना बेहतर है. हमें लगता था कि अदालत से हमें न्याय मिलेगा लेकिन हमें न्याय नहीं मिला. ढाई साल में हम बरबाद भी हो गए, हमारा आदमी भी मर गया. इससे ज़्यादा बुरा और क्या होगा?"
"हमें लगता था कि हमारे साथ अदालत न्याय करेगी, लेकिन अदालत भी न्याय नहीं कर रही है. कल से हमारे यहां शोक मनाया जा रहा है. किसी बच्चे ने खाना भी नहीं बनाया. वो लोग ख़ुशी मना रहे है. हम तो लुट भी गए, पिट भी. हमारा आदमी भी चला गया."
इरशाद का परिवार मामले को ऊंची अदालत में चुनौती देने पर अडिग है.
जब तक हमारी ज़िंदगी है तब तक लड़ते रहेंगे. छोड़ेंगे नहीं. चाहे कुछ भी बिक जाए. हमको जिस दिन मार देंगे तो हम केस को छोड़ देंगे.
लेकिन ऊँची अदालत में जाने से पहले ये समझने की कोशिश जारी है कि इस निचली अदालत में ये केस अभियोग पक्ष कैसे हार गया.
दोनो पक्ष पुलिस जांच की आलोचना कर रहे हैं.