शिवराज सिंह चौहान के 13 सालों के शासन के ख़िलाफ़ लोगों में ग़ुस्सा
होता तो दोनों पार्टियों में जीत का फ़र्क महज़ पाँच सीटों का नहीं होता.
मध्य प्रदेश के कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी भी इस बात से सहमत हैं कि लोगों में शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ उस तरह से नाराज़गी नहीं थी जैसी नाराज़गी मोदी सरकार और उसकी नीतियों से थी.
हालांकि बीजेपी ऐसा नहीं मानती है. बीजेपी का कहना है कि राज्य में जनादेश वहां की सरकार के पक्ष या ख़िलाफ़ में होता है और यह केंद्र की सरकार के आधार पर नहीं है.
बीजेपी प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ''यह केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जनादेश नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार के ख़िलाफ़ भी नहीं है. हमने कांग्रेस से ज़्यादा वोट हासिल किए हैं. जहां तक सीटें कम होने की बात है तो हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं. कहीं न कहीं तो हमारी चूक हुई है.''
मध्य प्रदेश में चुनाव के दौरान लोगों से बात करते हुए शिवराज सिंह के प्रति उनकी सहानुभूति छिपती नहीं थी. लोग उनके मंत्रियों की आलोचना करते थे, केंद्र सरकार की आलोचना करते थे लेकिन चौहान से सहानुभूति जताते थे. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने लोकसभा क्षेत्र विदिशा में जिस अजनास गांव को गोद लिया वहां के सुरेश व्यास भी उन्हीं लोगों में से हैं.
वो केंद्र सरकार और अपनी सांसद सुषमा के ख़िलाफ़ तो ग़ुस्सा दिखाते हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान से सहानुभूति जताते हुए कहते हैं, ''वो तो बहुत अच्छे हैं. उन्होंने ही तो कुछ किया है.''
भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ''मैं भी इस बात से सहमत हूं कि यह जनादेश शिवराज के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मोदी के ख़िलाफ़ है. अगर शिवराज के ख़िलाफ़ होता तो बीजेपी बुरी तरह से हारती. शिवराज प्रदेश में काफ़ी लोकप्रिय थे और उनकी लोकप्रियता में उस तरह से कोई कमी नहीं आई थी.''
हरदेनिया कहते हैं, ''शिवराज सिंह के ख़िलाफ़ जो बातें जाती हैं वो पार्टी के भीतर भी कई बार दिख जाती थी. पार्टी के सीनियर नेता रघुनंदन शर्मा तो चौहान को घोषणावीर कहते थे. बीजेपी में घमंड का बढ़ना भी एक समस्या थी. एबीवीपी के लोगों ने प्रोफ़ेसर की हत्या कर दी थी. हाल ही में एक प्रोफ़ेसर के मुंह पर कालिख पोत दी थी. ये सब ऐसी चीज़ें हैं जिनसे शिवराज की छवि एक अप्रभावी शासक के तौर पर भी बनी. लेकिन इसके साथ ही एक रुपए किलो गेहूं देना और सामूहिक शादियां जैसे प्रोग्राम काफ़ी हिट रहे.''
मध्य प्रदेश में किसानों पर शिवराज सिंह चौहान के शासन काल में गोलियां चलीं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिन बाद ही क़र्ज़ माफ़ी का वादा कर दिया था.
शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुई. 1988 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने. 1990 में पहली बार बीजेपी ने चौहान को बुधनी से विधानसभा चुनाव में खड़ा किया. चौहान ने पूरे इलाक़े की पदयात्रा की थी और पहला ही चुनाव जीतने में सफल रहे. तब चौहान की उम्र महज़ 31 साल थी.
1991 में 10वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी इस चुनाव में दो जगह से खड़े थे. एक उत्तर प्रदेश के लखनऊ और दूसरा मध्य प्रदेश के विदिशा से. वाजपेयी को दोनों जगह से जीत मिली. उन्होंने लखनऊ को चुना और विदिशा को छोड़ दिया. सुंदरलाल पटवा ने विदिशा के उपचुनाव में शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का प्रत्याशी बनाया और वो पहली बार में ही चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए.
इसके बाद यहां से चौहान 1996, 1998, 1999 और 2004 के भी चुनाव जीते. चौहान को अब तक के राजनीतिक जीवन में एक बार हार का सामना करना पड़ा है. 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने चौहान को मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ राघोगढ़ से खड़ा किया था.
तब बीजेपी ने उमा भारती को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था. इस चुनाव में शिवराज सिंह चौहान को हार का सामना करना पड़ा. चौहान को भी पता था कि राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह को हराना संभव नहीं है, लेकिन उन्होंने पार्टी की बात मानी.
उमा भारती के कुल आठ महीने और बाबूलाल गौर के 15 महीने मुख्यमंत्री रहने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने 29 नवंबर, 2005 को मध्य प्रदेश के 25वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
शिवराज सिंह चौहान उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद प्रदेश के तीसरे ओबीसी मुख्यमंत्री बने. इससे पहले मध्य प्रदेश के सारे मुख्यमंत्री सवर्ण रहे थे. उमा भारती के छोटे कार्यकाल में उनके व्यक्तित्व के कारण पार्टी को कई बार असहज होना पड़ा था. उमा भारती के इस्तीफ़े को बीजेपी ने बड़ी राहत की तरह देखा था. तिरंगा प्रकरण में उमा भारती को इस्तीफ़ा देना पड़ा था तो सुषमा स्वराज का एक प्रसिद्ध बयान सामने आया था, ''इट वॉज़ अ गुड रिडेंस.'' यानी इसी बहाने पार्टी को उमा भारती से मुक्ति मिली.
मध्य प्रदेश के कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी भी इस बात से सहमत हैं कि लोगों में शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ उस तरह से नाराज़गी नहीं थी जैसी नाराज़गी मोदी सरकार और उसकी नीतियों से थी.
हालांकि बीजेपी ऐसा नहीं मानती है. बीजेपी का कहना है कि राज्य में जनादेश वहां की सरकार के पक्ष या ख़िलाफ़ में होता है और यह केंद्र की सरकार के आधार पर नहीं है.
बीजेपी प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ''यह केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जनादेश नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार के ख़िलाफ़ भी नहीं है. हमने कांग्रेस से ज़्यादा वोट हासिल किए हैं. जहां तक सीटें कम होने की बात है तो हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं. कहीं न कहीं तो हमारी चूक हुई है.''
मध्य प्रदेश में चुनाव के दौरान लोगों से बात करते हुए शिवराज सिंह के प्रति उनकी सहानुभूति छिपती नहीं थी. लोग उनके मंत्रियों की आलोचना करते थे, केंद्र सरकार की आलोचना करते थे लेकिन चौहान से सहानुभूति जताते थे. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने लोकसभा क्षेत्र विदिशा में जिस अजनास गांव को गोद लिया वहां के सुरेश व्यास भी उन्हीं लोगों में से हैं.
वो केंद्र सरकार और अपनी सांसद सुषमा के ख़िलाफ़ तो ग़ुस्सा दिखाते हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान से सहानुभूति जताते हुए कहते हैं, ''वो तो बहुत अच्छे हैं. उन्होंने ही तो कुछ किया है.''
भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ''मैं भी इस बात से सहमत हूं कि यह जनादेश शिवराज के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मोदी के ख़िलाफ़ है. अगर शिवराज के ख़िलाफ़ होता तो बीजेपी बुरी तरह से हारती. शिवराज प्रदेश में काफ़ी लोकप्रिय थे और उनकी लोकप्रियता में उस तरह से कोई कमी नहीं आई थी.''
हरदेनिया कहते हैं, ''शिवराज सिंह के ख़िलाफ़ जो बातें जाती हैं वो पार्टी के भीतर भी कई बार दिख जाती थी. पार्टी के सीनियर नेता रघुनंदन शर्मा तो चौहान को घोषणावीर कहते थे. बीजेपी में घमंड का बढ़ना भी एक समस्या थी. एबीवीपी के लोगों ने प्रोफ़ेसर की हत्या कर दी थी. हाल ही में एक प्रोफ़ेसर के मुंह पर कालिख पोत दी थी. ये सब ऐसी चीज़ें हैं जिनसे शिवराज की छवि एक अप्रभावी शासक के तौर पर भी बनी. लेकिन इसके साथ ही एक रुपए किलो गेहूं देना और सामूहिक शादियां जैसे प्रोग्राम काफ़ी हिट रहे.''
मध्य प्रदेश में किसानों पर शिवराज सिंह चौहान के शासन काल में गोलियां चलीं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिन बाद ही क़र्ज़ माफ़ी का वादा कर दिया था.
शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुई. 1988 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने. 1990 में पहली बार बीजेपी ने चौहान को बुधनी से विधानसभा चुनाव में खड़ा किया. चौहान ने पूरे इलाक़े की पदयात्रा की थी और पहला ही चुनाव जीतने में सफल रहे. तब चौहान की उम्र महज़ 31 साल थी.
1991 में 10वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी इस चुनाव में दो जगह से खड़े थे. एक उत्तर प्रदेश के लखनऊ और दूसरा मध्य प्रदेश के विदिशा से. वाजपेयी को दोनों जगह से जीत मिली. उन्होंने लखनऊ को चुना और विदिशा को छोड़ दिया. सुंदरलाल पटवा ने विदिशा के उपचुनाव में शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का प्रत्याशी बनाया और वो पहली बार में ही चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए.
इसके बाद यहां से चौहान 1996, 1998, 1999 और 2004 के भी चुनाव जीते. चौहान को अब तक के राजनीतिक जीवन में एक बार हार का सामना करना पड़ा है. 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने चौहान को मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ राघोगढ़ से खड़ा किया था.
तब बीजेपी ने उमा भारती को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था. इस चुनाव में शिवराज सिंह चौहान को हार का सामना करना पड़ा. चौहान को भी पता था कि राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह को हराना संभव नहीं है, लेकिन उन्होंने पार्टी की बात मानी.
उमा भारती के कुल आठ महीने और बाबूलाल गौर के 15 महीने मुख्यमंत्री रहने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने 29 नवंबर, 2005 को मध्य प्रदेश के 25वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
शिवराज सिंह चौहान उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद प्रदेश के तीसरे ओबीसी मुख्यमंत्री बने. इससे पहले मध्य प्रदेश के सारे मुख्यमंत्री सवर्ण रहे थे. उमा भारती के छोटे कार्यकाल में उनके व्यक्तित्व के कारण पार्टी को कई बार असहज होना पड़ा था. उमा भारती के इस्तीफ़े को बीजेपी ने बड़ी राहत की तरह देखा था. तिरंगा प्रकरण में उमा भारती को इस्तीफ़ा देना पड़ा था तो सुषमा स्वराज का एक प्रसिद्ध बयान सामने आया था, ''इट वॉज़ अ गुड रिडेंस.'' यानी इसी बहाने पार्टी को उमा भारती से मुक्ति मिली.